उस चिड़िया का नाम (लेखक : पंकज बिष्ट)
उत्तराखंड के पहाड़ को समझना हो तो पहाड़ के लेखक को पढ़ना जरूरी है। और अगर ऐसा पहाड़ी लेखक मिल जाए, जो संस्कृत, अंग्रेजी और गुजराती का जानकार होने के साथ-साथ लोककथाओं का भी विद्वान हो, तो फिर कहानी पढ़ने में जो मन लगता है, उसमें समय का ध्यान ही नहीं रहता।
पहाड़ी लोकजीवन की साधारण-सी घटनाओं को लेखक ने जिस प्रकार पात्रों और परिस्थितियों में गढ़ा है, वह कोई विरला लेखक ही कर सकता है। कुमाऊँ के इतिहास को वर्तमान कथानक से जोड़ने के साथ-साथ पहाड़ की समस्याओं और उनके संभावित समाधान को भी लेखक ने अपने पात्रों के माध्यम से सामने रखा है।
‘खस्या रीस, भैंस तीस’ जैसे स्थानीय मुहावरों का प्रयोग स्थानीय पाठक की जिज्ञासा और अपनापन बनाए रखता है, वहीं ‘नाइट्रोफ्यूसाइड’ और ‘हाइड्रालाजाइन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल अन्य पाठकों को भी कथानक से बाँधे रखता है। यही विविधता इस उपन्यास को केवल पहाड़ की कहानी न रहकर एक व्यापक मानवीय कथा बना देती है।
मृतक क्रिया-कर्म में अपनाई जाने वाली परंपराओं और पद्धतियों का चित्रण करते हुए लेखक ने एक परिवार के ताने-बाने और उसकी धार्मिक मान्यताओं का जैसे पोस्टमार्टम ही कर दिया है। कथा आगे बढ़ती है तो रहस्य भी गहराता जाता है।
रमा अपने बारे में जानने की कोशिश करती है, हरीश अपनी खोज में जासूस की तरह आगे बढ़ता है और पार्वती का मर्ज भी बढ़ता जाता है। पार्वती की बीमारी के साथ उसके पिता दीवान सिंह अधिकारी के अतीत और उनके राज की परतें भी धीरे-धीरे खुलती जाती हैं। हरीश अपनी माँ दुर्गा देवी की याद में भीतर से अधमरा-सा है, लेकिन अपने बेटे वरुण के लिए उसकी उत्सुकता और उम्मीद उसे आगे बढ़ाती रहती है।
पहाड़ की प्रतिभा विपरीत परिस्थितियों में भी अपना रास्ता बना सकती है—डॉक्टर रमा इसका सशक्त उदाहरण है।
जानवरों और मनुष्य के बीच के लगाव को लेखक ने जिस आत्मीयता से उकेरा है, उसे पढ़ते हुए लगता है कि पशु-पक्षियों के प्रति पहाड़ की संवेदना को पंकज बिष्ट से बेहतर कौन समझ सकता है।
उपन्यास में जब इतिहास की कथा वर्तमान के साथ जुड़ती है तो कई जगह सिरहन पैदा होती है। कत्यूरियों के इतिहास से लेकर अंग्रेजों के अत्याचार और उनके विरुद्ध हुए प्रतिकार तक को कथा का हिस्सा बनाया गया है। चम्पावत के कालू मेहरा जैसे सेनानी का उल्लेख भी इस पुस्तक के माध्यम से मेरे लिए एक नई ऐतिहासिक जानकारी रहा।
यह उपन्यास केवल रहस्य और रोमांच की कहानी नहीं है। यह अपनी जड़ों को जानने, अपने समाज को पहचानने और पहाड़ की बदलती सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझने का भी अवसर देता है। पलायन, आधुनिक खेती और पहाड़ से लगातार दूर होती नई पीढ़ी जैसे सवाल कथा के भीतर सहज रूप से उपस्थित रहते हैं।
अपनी जड़ों को जानने के लिए, अपने समाज को पहचानने के लिए और उस पहाड़ को समझने के लिए, जो धीरे-धीरे हमसे दूर होता जा रहा है—पंकज बिष्ट का यह रहस्यमय उपन्यास पढ़ना ही चाहिए।
क्योंकि हम सब शायद उसी ‘चिड़िया’ का नाम ढूँढ़ रहे हैं, जो हमारे बीच ही कहीं गुम हो गई है।






Very well explained and great story
बहुत शानदार समीक्षा है।