मुसाफिर कैफे (लेखक : दिव्य प्रकाश दुबे)
नये जमाने के लेखक है दिव्य प्रकाश दुबे, तो उनका उपन्यास भी दिव्य है, पूर्व की 'शादी' को पश्चिम का जामा पहनाया है - मुसाफिर कैफे में।
उपन्यास मे पहाड हंसते है,प्याली चुमती है। प्यार और शादी को शहरी नजर से दर्शाया है। महानगरीय जीवन मे मशीन के जैसे काम करना, और अंग्रेजी भरपेट पीकर , भैंस के जैसे सोना, बिना किसी बन्धन में बंधे जीना। जब मन भर जायें,दूसरे के साथ बिना रोक-टोक बिना सवाल जवाब के महीना बीता देना,कुछ ऐसे मोबाइल के नेटवर्क जैसे लचीले सम्बन्ध बनाने पर जोर देती है सुधा और पम्मी, ऐसी ही सोच को विकास कहते है।
तितली अपने लडके मोहन को बताती है बेटा तेरी माॅ ने ऐसा कोई काम नहीं किया,जिससे तुझे शर्म हो?
सुधा,अक्षर को बता ही नहीं पाती कि उसका पिता विनीत है या चन्दर,पम्मी उसकी बडी मम्मी है,ये जरूर बताती है,जब अक्षर पुछता है आपकी शादी कब हुई तो तीनों बेहया की तरह,हॅस देते है।
ऐसा नही हे कि दुबे जी प्रेम कहानी ही कह रहे है,वो पुस्तक प्रेमी भी है,घुमने के शौकीन भी।
अब घुमते फिरते शादी तो नही बच्चे पैदा करने की नसीहत दे ही देते है। वो भी पंचतंत्र की सीख के साथ।
143 पेज के उपन्यास में बोरियत महसुस नही होती है, जब और जानने की जिज्ञासा बडती है,कहानी का सुखान्त हो जाता है।
मुंबई से निकले पात्र उत्तराखंड मे मिलते है। वाक्य छोटे है,हिन्दी के हिंग्लिश का अच्छा मेल किया है।
हाॅ उपन्यास पढकर लगता तो है- काश ऐसा होता?
कैसा ये जानने के लिए इस दमदार कहानी को अपने नजरिए से पढना होगा।






बहुत बेहतरीन समीक्षा की गई है ।