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डार से बिछुड़ी (लेखिका : कृष्णा सोबती)

दीपक कुमार
Aug 6
4 min read

"डार से बिछुड़ी" कृष्णा सोबती की कालजयी कृति है, जो 1849 के सिख-अंग्रेज युद्ध की पृष्ठभूमि में स्त्री जीवन के संघर्ष, शोषण और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। यह सिर्फ एक लड़की की कहानी नहीं है, बल्कि उस स्त्री की कथा है, जिसे केवल लड़की होने के कारण जीवनभर यातनाएँ सहनी पड़ीं। कृष्णा सोबती ने इस उपन्यास के माध्यम से नारी शोषण, सामाजिक रूढ़ियों और पितृसत्ता की जड़ता को बड़ी ही संवेदनशीलता से उजागर किया है।


कथानक


कहानी की नायिका बचपन से ही अपने ननिहाल में मामा-मामी के साथ रहती है। उसका बचपन सुखद बीता, लेकिन किशोरावस्था में कदम रखते ही उसका सौंदर्य उसके लिए अभिशाप बन गया। मामा-मामी उसकी सुंदरता को लेकर चिंतित थे कि कहीं वह अपनी माँ की तरह जाति से बाहर विवाह न कर ले। लड़की के नयन-नक्श ही उसके लिए सबसे बड़े दुश्मन बन गए।


माँ का विवाह उसके जीवन पर भारी पड़ गया। मामा-मामी के तानों और संदेहों के बीच उसकी जिंदगी कट रही थी। लेकिन स्थिति तब विकट हो गई जब मामा-मामी ने उसे मारने की ठान ली। जान बचाने के लिए वह घर से भागकर खोजों की हवेली में शरण लेती है। हवेली के बारे में उसकी नानी पहले ही चेतावनी दे चुकी थी –

"संभलकर री, एक बार थिरका पांव, जिन्दगानी धूल में मिला देगा।"


हवेली में उसे माँ का प्यार और भाई का सहारा मिला, लेकिन उस पर करीम से संबंध का संदेह किया गया। बवाल के डर से शेख ने उसकी शादी उससे चौगुनी उम्र के दीवान जी से कर दी। लड़की ने इसे भी अपनी नियति मान लिया। उसे रानी जैसा सुख मिला। एक पुत्र हुआ। लेकिन भाग्य ने फिर करवट बदली और दीवान जी चल बसे।


इसके बाद उसका जीवन फिर से अभिशप्त हो गया। दीवान जी के भाई बरकत अली ने उसका शोषण किया और फिर उसे लाला जी के हाथों बेच दिया। अब वह लाला जी की बांदी बन गई। लाला जी के मझले बेटे ने जबरन उसे अपने साथ रखा और शारीरिक शोषण किया। लड़की ने इसे प्रेम समझा और उसे समर्पित हो गई। लेकिन मझला भी युद्ध में मारा गया।


हवेली से भागते हुए वह अंग्रेजों की तोपों की आवाज से भयभीत हो गई। वह भागकर एक क्षत्रिय राजा के पास पहुँची। राजा की माँ ने कहा –

"ये हमारे भाग से आई है, तेरा युद्ध में क्या होगा, क्या पता, तू इसकी कोख में अपना बीज डाल जा।"

लेकिन राजा ने उसे बहन माना और ऐसा सोचना भी उसके लिए पाप था।


लड़की अपने दुर्भाग्य पर रोती रही। उसे तीन प्रेमी और दो भाई मिले, लेकिन सभी युद्ध में मारे गए। उसे लगने लगा कि अब उसकी नीलामी होगी और इस बार शायद फिरंगी उसे खरीदेंगे। लेकिन भाग्य ने फिर उसका साथ दिया। उसकी माँ और मौसी उसे मिल गईं। माँ ने कहा –

"बेटी के वीर को बुलाओ, बिछुड़ी बिटिया हमारी डार से आ मिली।"


सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ


"डार से बिछुड़ी" में सोबती ने 1849 के सामाजिक और ऐतिहासिक परिदृश्य को बड़ी ही कुशलता से उकेरा है। उस समय के युद्धों, जातीय भेदभाव, स्त्री की असुरक्षा और सामाजिक शोषण का यथार्थपूर्ण चित्रण किया गया है। नायिका का संघर्ष केवल उसके व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस दौर की हर नारी की त्रासदी है, जो पुरुषसत्ता और सामाजिक बंधनों के बीच पिस रही थी।


सोबती ने इस उपन्यास में नारी मन की जटिलताओं, उसकी पीड़ा और समाज द्वारा उस पर लगाए गए प्रतिबंधों को बहुत ही सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया है। उपन्यास की नायिका का भाग्य, उसकी नियति और समाज का उसके प्रति दृष्टिकोण – ये सब आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय थे।


भाषा और शैली


कृष्णा सोबती की लेखनी का जादू इस उपन्यास में पूरी तरह बिखरा हुआ है। भाषा में सादगी और सहजता है, जो पाठक को कथा से जोड़कर रखती है। संवाद छोटे और सटीक हैं, जिनमें भावनाओं की तीव्रता स्पष्ट झलकती है। सोबती ने बिना किसी आडंबर के कथा को इतने सशक्त रूप में प्रस्तुत किया है कि पाठक उपन्यास के हर मोड़ पर नायिका की पीड़ा और संघर्ष को महसूस करता है।


प्रासंगिकता


"डार से बिछुड़ी" एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में लिखी गई रचना होते हुए भी आज के समाज पर उतनी ही सटीक बैठती है। आज भी अंतर्जातीय विवाह पर ऑनर किलिंग होती है। आज भी 'पाशो' जैसी लड़कियाँ शोषित और दमित हैं। आज भी समाज में नारी को अपनी पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ता है। सोबती ने नायिका के माध्यम से समाज के इस कटु यथार्थ को उजागर किया है।


समीक्षा का सार


✔️ उपन्यास का कथानक स्पष्ट और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

✔️ भाषा को प्रवाहमय और सशक्त बनाया गया है।

✔️ समीक्षा को पेशेवर शैली में ढाला गया है।

✔️ कहानी के प्रमुख बिंदुओं को संतुलित और व्यवस्थित ढंग से रखा गया है।

✔️ सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों को जोड़कर समीक्षा को गहराई दी गई है।




निष्कर्ष


"डार से बिछुड़ी" एक कालजयी रचना है, जो नारी शोषण और सामाजिक पितृसत्ता की जड़ता को बड़ी गहराई से उजागर करती है। कृष्णा सोबती ने इस उपन्यास के माध्यम से नारी के संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके भीतर छिपी असाधारण सहनशक्ति को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास को हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए, जो समाज की वास्तविकता को समझना चाहता है।

 
 
 

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