दीवार में एक खिडकी रहती थी (लेखक : विनोदकुमार शुक्ल)
हमारा घर होता है, घर मे दरवाजा होता है,खिडकी होती है। शुक्ल जी के उपन्यास मे जो खिडकी है, वो रास्ता है अपने सपनों के खुले आशियाने मे जाने का, जैसे फार्म हाउस मे बंगला हो, उसमे बगीचा हो, बगीचे में स्वीमिंग पुल हो, पुल मे आराम कुर्सी हो,जब उपन्यास का नायक रघुवर प्रसाद अपनी नवयौवना पत्नी सोनसी,के साथ अपनी खिडकी से बाहर निकलते है तो सीधे प्राकृतिक फार्म हाउस मे पहुचते है,जहां अपने खुले तालाब मे नहाते है, स्नेक्स के तौर पर बुडी अम्मा चाय देती है, और दोनों भुगतान के रूप मे अम्मा को आदर देते है।
उपन्यास की कथा मे हाथी और साधु है। हाथी मे बैठ कर रघुवर प्रसाद महाविद्यालय जाते है, जैसे आजकल प्रोफेसर स्कार्पियो मे कालेज जाते है।
रघुवर प्रसाद और सोनसी कहानी के मुख्य पात्र है जो अभाव ग्रस्त जीवन जीकर भी खुश है,गणित के प्रोफेसर होकर भी विद्यार्थी को फ्री ट्युशन देते वो भी खुले आकाश मे बिजली के खम्भों के बीच, 'प्रोफेसर की डायरी' की तरह कोई शिकायत नहीं और उनके साथ भी विभागाध्यक्ष और प्रचार्य का 'लक्ष्मण यादव ' की तरह कोई षडयंत्र नहीं। उपन्यास मे कहानी कहने का तरीका सरल है,मजे की बात उपन्यास मे कोई कहानी नही,कोई नई बात नहीं फिर उपन्यास पुरक है। न लोभ,न मोह,न वासना, न क्रोध ,सिर्फ सम्मान और प्रेम। रघुवर प्रसाद अपने पिता का सम्मान करते है,छोटू अपनी भाभी का सम्मान, बुडी अम्मा निः स्वार्थ सोने के कंगन सोनसी को दे देती है।
सोनसी निःस्वार्थ हाथी की सेवा करती है। पेड मे रहने वाले लडके को भात खिलाती है।
आपके शब्दों की कारीगरी है तो अपनी बात को सरलता से कैसे कहते है,इस उपन्यास से सीख सकते है। जो कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह जाता है। हर पात्र अपने आप में पुरा है,अधुरा कुछ भी नहीं।
आधुनिक जीवन शैली से दूर, पर आधुनिकता पर करारा तमाचा,सोनसी,गौरी और सुन्दर,रघुवर काला , फिर भी दोनों मे प्रेम है। आजकल तो पत्नी सुन्दर होने पर भी ससुराल वाले ताना देते है,हर हफ्ते पति- पत्नी के नये किस्से आते है।
एक कमरे के मकान को इस दम्पति ने घर बनाया और घर मे खिडकी, इस खिडकी मे आप खडे होकर, बैठकर पुरा उपन्यास पढ सकते हो, और हाॅ मकान किराये का है,रघुवर प्रसाद गाॅव का है। कहानी पुरानी जरूर है,पर आज के लेखकों को आईना दिखाती है।






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