top of page

नौकर की कमीज (लेखक : विनोद कुमार शुक्ल)

दीपक कुमार
Sep 20
2 min read

आजकल सोशल मीडिया पर 1980 के दशक के बिखरे बाल और बैगी पैंट को अपने स्टेटस में लगाने का चलन है। ऐसे समय में राजकमल पेपरबैक्स द्वारा प्रकाशित ‘नौकर की कमीज’ उपन्यास हमें 1980 के दशक की वास्तविकता से परिचित कराता है।


चतुर्वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज में गहरे तक अपनी पैठ बनाए हुए है। इसका प्रभाव भारतीय नौकरशाही में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सरकारी अधिकारियों के बंगलों में किस प्रकार तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी कार्य करते हैं और किन पीड़ाओं से गुजरते हैं, लेखक ने इसे अपनी कलम से बहुत सहज ढंग से दर्शाया है।



उपन्यास की कहानी एक साधारण पति-पत्नी की है, जो अपनी नई गृहस्थी को जमाने की कोशिश कर रहे हैं। इस कोशिश में होने वाली उनकी नोक-झोंक और उनके आसपास के विभिन्न चरित्र कहानी को रोचक और मजेदार बना देते हैं।


आज हमारे पास परिवहन और संवाद के लिए नित नए ऐप हैं, जो उस समय के अभाव को समझने में मदद करते हैं। आज हम बाहर घूमने और खरीदारी करने के लिए क्रेडिट कार्ड और ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग करते हैं, जबकि उस समय दुकानदार ही खरीदारी का प्रमुख माध्यम था। इस तरह उपन्यास उस समय के जीवन और आज के जीवन के बीच का अंतर भी सामने रखता है।


कहानी के छोटे-छोटे संवाद धीरे-धीरे एक सिरे को दूसरे सिरे से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए—

“चन्द्रमा आकाश से कहीं नहीं जा सकता। यदि वह नहीं दिखता तो वह बादलों में छुपा होगा।”


एक गृहिणी आने वाले कठिन समय के लिए किस प्रकार पैसे बचाकर रखती है, यह दूलहिन की बातों से पता चलता है—

“मुझे ब्लाउज की जल्दी नहीं है, रहने दो। वे रुपये मैंने वक्त-जरूरत के लिए बचाकर रखे हैं।”



उपन्यास पढ़कर यह भी पता चलता है कि उस समय पड़ोसियों के साथ मधुर संबंधों का जीवन में कितना महत्व था। छोटे-छोटे सहयोग और आपसी संबंध रोजमर्रा के जीवन को सहज बनाते थे।


मकान-मालिक और साहब को सलाम करते हुए नायक, बड़े बाबू, देवांगन और गौराहा बाबू के साथ महँगू को भी सरकारी बेगारी से बाहर निकालने में सफल होता है। यह उसके लिए छोटी-सी बात नहीं, बल्कि एक बड़ी उपलब्धि है।


विनोद कुमार शुक्ल की यह कहानी 1980 के दशक की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है, लेकिन इसकी संवेदनाएँ और इसमें उठाए गए सामाजिक प्रश्न आज, 2026 में भी उतने ही प्रासंगिक दिखाई देते हैं। यही इस उपन्यास की विशेषता है कि समय बदल गया, जीवन के साधन बदल गए, लेकिन मनुष्य, उसके संबंध और सामाजिक असमानताओं से जुड़े अनेक प्रश्न आज भी हमारे सामने मौजूद हैं।

 
 
 

2 Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
Guest
Sep 20
Rated 4 out of 5 stars.

आप जो भी उपन्यास पढ़ते है उसका निष्कर्ष अत्यंत रोचक होता हैं कम शब्दों में प्रभावी बातो को समझना और समझाना आधुनिकता के साथ अत्यंत प्रभावी । अतिसुन्दर ।

Like

Guest
Sep 20
Rated 5 out of 5 stars.

Great review !

Like

अन्य पुस्तक समीक्षाएँ

bottom of page