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रतिनाथ की चाची (लेखक : नागार्जुन)

दीपक कुमार
15 hours ago
2 min read

औरत होना अपने आप में एक कठिन चुनाव है। हालाँकि लिंग, जाति,वर्ण, या देश चुनना किसी के हाथ मे नहीं होता है। अगर होता तो शायद ही कोई सनातन धर्मी भारत मे जन्म लेना चहाता, कर्म की खानी 'गौरी' ने बिहार प्रदेश के तरकलुवा गाँव के उच्च कुल ब्राह्मण परिवार में जन्म भी लिया और 14-15 वर्ष की अवस्था अपने से तीन गुने दमा के रोग से ग्रस्त वेद्यनाथ से विवाह भी किया। एक पुत्र के जन्म के बाद ही उसके पति स्वर्ग को सिधार भी गये।

गौरी अपनी देवरानी से जब तक सही प्रकार से परिचित होती, उसके पति जयनाथ ने अपनी पत्नी की बीमारी से त्रस्त होकर उसे स्वंय ही स्वर्ग का रास्ता दिखा दिया।



ये सब 3-4 वर्ष के रतिनाथ ने अपनी आँखों से देखा और सिहर गया। भंगेडी बाप के गुस्से से उस बिन माँ के पूत को उसकी चाची ने अपने कलेजे से लगाकर पाला।

असमय वैधव्य जीवन जीना भी उस निरही जान का दुश्मन बन गया, जब पोथी बांचने वाले उसके देवर ने ही उसके साथ जबरदस्ती कर 8 माह का गर्भ बना दिया। ये ही नागार्जुन के उपन्यास की मुख्य थीम है, जिसमें आने वाले झंझावात को अपनी कुशल लेखनी से लेखक ने मामिर्क कहानी का रूप दिया है।

उपन्यास के सभी पात्रों ने अपनी सजीव भूमिका निभाई है। रेणू से बहुत पहले नागार्जुन ने अपने उपन्यास मे गाँव के जीवन को उकेर दिया है। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक को गुलाम भारत का भान तो होता ही है, साथ ही जातिगत भेदभाव, अबला ब्राह्मणी महिला के अकथनीय दुख का भी ज्ञान हो जाता है। लेखक ने पलायन की समस्या को उठाया है, जो 100 साल बाद आज भी बनी हुई है। संवाद सरल और क्षेत्रीय शब्द से भरे पड़े हैं। जो रोचक भी है। कुरीतियों का ऐसा रैला जो आज भी वैसी ही बना है। सोचने पर मजबूर करता है, आजाद भारत ने गाँव की समस्या के निदान के लिए क्या कदम उठाए?



महिलाएं पढ लिखकर जाॅब तो कर रही है, उनकी स्थिति मे अन्तर 19-20 ही है।


हिन्दी के प्रख्यात आलोचक नागार्जुन के उपन्यास में कमियां इंगित करना सूर्य को दिया दिखाना हो जायेगा। किसी ने सनातन को समझना है तो 'रतिनाथ की चाची' को पढना होगा। इसमें निश्छल प्रेम और वासना का अभूतपूर्व संगम है, जिसे समझने के लिए वाणी प्रकाशन की 'नागार्जुन चुनी हुई रचना' को पढना पढेगा।

 
 
 

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Guest
2 hours ago
Rated 5 out of 5 stars.

Wow ✨🪻

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