प्रोफेसर की डायरी (लेखक : डॉ. लक्ष्मण यादव)
‘प्रोफेसर की डायरी’ एक युवा अकादमिक की जमीनी सच्चाइयों से भरी कहानी है। भारत, जो 21वीं सदी में "विश्व गुरु" बनने का सपना देख रहा है, अभी भी कई मायनों में मध्यकालीन मानसिकता से ग्रस्त है। इस विरोधाभास को लेखक ने बेहद प्रभावशाली ढंग से अपनी डायरी में उकेरा है।
लेखक डॉ. लक्ष्मण यादव ने 21 वर्ष की उम्र में एम.ए. में गोल्ड मेडल हासिल कर दिल्ली विश्वविद्यालय में एक एडहॉक शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। लेकिन 14 वर्षों के इस अकादमिक सफर में उन्हें किन-किन समस्याओं और मानसिक संघर्षों से गुजरना पड़ा, उसका ईमानदार, संवेदनशील और सजीव चित्रण इस पुस्तक में किया गया है।
लेखक ने उन युवाओं की आवाज़ बनने की कोशिश की है जो संविदा (एडहॉक) जैसे अस्थायी पदों पर काम करते हुए भी पूर्णकालिक कर्मियों से अधिक योगदान देते हैं, परंतु उन्हें आधी तनख्वाह और नगण्य सुविधाएं मिलती हैं।
यह पुस्तक न सिर्फ शैक्षणिक व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे जातीय और क्षेत्रीय मानसिकता आज भी विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है।
पुस्तक का एक और मार्मिक पक्ष यह है कि किस प्रकार एक मध्यमवर्गीय परिवार में माता और चाचा जैसे परिजनों का समर्थन किसी युवा के आत्मबल को जीवित रखता है।
लेखक की शैली सरल, संक्षिप्त और प्रभावशाली है। छोटे-छोटे अध्यायों में गहरे अनुभव और प्रश्न समाहित हैं।
यह पुस्तक सिर्फ एक शिक्षक की डायरी नहीं, बल्कि आज के भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर एक सवाल है। लेखक अपने उद्देश्य में सफल हों – ऐसी शुभकामनाओं के साथ यह पुस्तक पढ़े जाने योग्य और विचारणीय है।






Comments