रागदरबारी (लेखक : श्रीलाल शुक्ल)
महात्मा गांधी का कथन है - "भारत गाँव में बसता है।" इस कथन को रागदरबारी में श्रीलाल शुक्ल ने अपनी व्यंग्यात्मक शैली मै सिद्ध कर दिया है।
'रागदरबारी' के कथानक उत्तर प्रदेश के कस्बाई गाँव शिवपाल गंज मे रचे गये हैं।
ग्रामीण जीवन के हर पहलू का उपन्यास मे बारीकी से चित्रण किया गया है। शुरूआत में जब तक कहानी का समां नहीं बंधता उपन्यास बोरिंग लगता है, समां बंधने के बाद 334 पेज का उपन्यास कब खत्म हुआ पता ही नही चलता।

शिवपाल गंज गाँव के सभी किरदार महत्वपूर्ण हैं। गाँव मे एक फूल दो माली की असफल प्रेम कहानी है। भले ही दोनो भाई हैं। एक दिव्यांग है जो तहसील से बिना घूस के नकल निकालने का संघर्ष करता है। उस समय विजिलेंस सक्रिय नही होगी। छंगामल इन्टर काॅलेज के अध्यापकों का रोचक संघर्ष है, आपस की गुटबाजी के कारण विद्यार्थी अध्यन कम राजनीति अधिक करते हैं। खन्ना मास्टर की वाइस प्रिन्सिपल बनने की चाहत उन्हें विद्यालय से ही बाहर कर देती है। अनुसूचित जाति के नाम पर आये अनुदान को खाने की तरकीबें है। विकास और अशिक्षा से वंचित उनकी व्यथा को भी लेखक ने बोल दिये हैं।
उस समय दरोगा, प्रिन्सिपल, मास्टर, पंचायत मन्त्री गाँव मे रहकर कार्य करते थे और गाय भी पालते थे। अंग्रेजी शिक्षा के लिए पलायन शुरू हो चुका था जो आज भी जारी है।
कहानी में ब्राह्मण वैद्य जी की महत्वपूर्ण भूमिका है, गाँव मे काॅपरेटिव सोसाइटीज से लेकर थाना, विद्यालय सब उनके अधीन है, गबन होने पर उनकी जाँच भी होती है। उनकी छत्रछाया में 'सनीचर' गाँव का प्रधान बन जाता है। गाँव प्रधान की हैसियत से कभी कभार रोब भी झाड लेता है।

ग्रामीण जीवन की मस्ती, गाली-गलौज, अदालती दाॅवपेच सब को मिलाकर बनता है, वैद्य जी का रागदरबार, जिसके किरदार कहलाये गये 'रागदरबारी'। और उपन्यास पढते हुये आपको भी रागदरबार का साक्षात अनुभव होगा, ये तो पक्का है, लेखन शैली व्यंग्यात्मक है, पर अपनी बात पूरी कहती है। वैद्य जी गयादीन से रिश्ते की बात करने जाते है तो गयादीन की भैंस गाभिन होने के लिए भैंसे के लिए परेशान है। कह सकते है, कहीं पे तीर कहीं पे निशाना। गाँव की समस्या को वैश्विक समस्या भी श्री शुक्ल ही बना सकते हैं। इस उपन्यास को राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है और इसका मूल्य है 399 रूपए ।






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