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संन्यासी और सुन्दरी (लेखक - यादवेन्दर शर्मा 'चन्द्र ')

दीपक कुमार
Aug 23
1 min read

पुरुष और स्त्री सम्बन्ध आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व भी प्रेम और वासना मे लिप्त था।

स्त्री की सहमति को उस समय भी सम्मान दिया जाता था।

वासवदत्ता नगर की प्रसिद्ध गणिका है। जिसके सौन्दर्य मे मोहित होकर नगर का सामन्त पुत्र मनू, अपना धन,वैभव तो हारता ही है, अपनी धर्मपत्नी को दुख भी देता है। मनू जहां वासवदत्ता पर लालायित है,वहीं अपनी दासी पर भी वासनात्मक प्रेम रखता है।

वासवदत्ता नगर कवि राहुल से प्रेम सम्बन्ध बनाने की इच्छा अभिव्यक्त करती है,जिसे नगर कवि मना कर देता है। राहुल के इस इन्कार को वासवदत्ता अपना अपमान समझती है और इस तिरस्कार का बदला लेने के लिए उसे सम्पत्ति से बेदखल करवा देती है। अपने शिष्य और धर्म की रक्षा के लिए आचार्य उप गुप्त आते है,परिस्थिति ऐसी बनती है कि मनू वासवदत्ता के हाथों इहलोक को गमन करता है। वासवदत्ता को सौन्दर्य विहिन कर नगर से बाहर कर दिया जाता है। आचार्य उसे बौद्ध धर्म का सम्बल देते हुये,धर्म के सन्मार्ग पर प्रेरित करते है।

स्त्री-पुरुष सम्बन्ध की प्राचीन कहानी,जो शास्त्रीय भाषा मे लिपिबद्ध है। आज ढाई हजार साल बाद भी उतनी ही प्रासंगिक ।

 
 
 

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