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सवर्ण और अवर्ण की उत्पत्ति (लेखिका : सुवीरा जायसवाल)

दीपक कुमार
Aug 13
2 min read

सवर्ण और अवर्ण की उत्पत्ति: 'दलित' समस्या की ऐतिहासिक जड़ें- सुवीरा जायसवाल के लेख संग्रहों का प्रथम लेख है उक्त शीर्षक। जिसमे लेखिका ने प्राचीन काल से ईसा पूर्व मै ही जाति व्यवस्था का उदय होना बताया है। लेख मे पाणिनि के अष्टाध्यायी का उदाहरण तो दिया ही है, कल्हण की राजतंरगणी का भी उदाहरण दिया है। लेख विस्तृत है जो सवालों के जवाब पाने के लिए ज़रूरी भी है।

पुस्तक का दूसरा लेख 'दलित अस्मिता और एजेण्डा 'जाति विनाश ' का है जिसमे लेखिका ने जाति का विनाश का उपाय अन्तर्जातीय विवाह को बताया है, जिसमे ये भी स्पष्ट किया है, यदि वंचित तबके से अपरकास्ट मे शादी की जाती है तो सामाजिक बहिष्कार भी सहना पड सकता है व वंचित तबको में भी जाति विभाजित हे।

तीसरा लेख 'भक्ती द्राविड उपजी : वैष्णव धारा में रामभक्ति का समाजिक आधार ( आलवारों से तुलसी तक) इस लेख मे भक्ति के सभी पहलुओ मे चर्चा की गयी, जिससे सिक्ख, बौद्ध, जैन धर्म पर भी प्रकाश डाला है।वैष्णव परम्परा के अतिरिक्त शै व मार्ग पर भी चर्चा की है। लेखिका अन्त मे बताती भी है सगुण रामभक्ति की कट्टरता के कारण ही नारी की पराधीनता और जातीय कट्टरता विद्यमान है।

विष्णु के अर्द्धपशु अर्द्धमानव अवतार:नरसिंह और हयग्रीव, लेख दक्षिण भारत की किवदंती को उजागर करता है। लेख मे बौद्ध धर्म के ह्रास और हिन्दु धर्म के उत्थान के बारे मे बताया गया है। शैव और विष्णु सम्प्रदाय की कट्टरता पर भी प्रकाश डाला गया है। हिन्दु धर्म अपने ही अंगो से नफरत करता है (शैव- वैष्णव ) फिर शुद्रों से वैमनस्य तो स्वाभाविक ही है।

'वैदिक ग्रन्थों में नारी की संरचना ' पुस्तक का चौथा लेख है, जिसमे बताया है नारी चाहे किसी भी वर्ण की हो शुद्र के समान ही है। वैदिक काल मे स्वंय इन्द्र ने कहा स्त्रियों की बुद्धि छोटी होती है।( पेज 224), उस काल मे भी महिलाओं को देखकर देवता स्खलित हो जाते थे। अब तो बात ही क्या करनी।

पुस्तक का अंतिम लेख है, 'हिन्दू धर्म ' की ऐतिहासिक पृष्टभूमि तथा 'हिन्दुत्व ' की राजनीति , इस लेख मे धर्म परिवर्तन के साथ ही बौद्ध धर्म के पतन पर चर्चा की है। दयानंद सरस्वती के द्वारा चलाये गय सुधार उपाय पर भी प्रकाश डाला है।

सेतु प्रकाशन से प्रकाशिक इस किताब का एक एक वाक्य गहरे अर्थों को व्यक्त करता है। लेखिका ने व्यापक शोध, गहन अध्ययन के बाद,इन ज्वलन्त मुद्दों पर अपनी लेखनी चलायी है। निस्सन्देह प्रत्येक नागरिक के लिए संग्रहणीय पुस्तक जो हिन्दू धर्म का पालन करता हो।

 
 
 

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